यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥"Whenever there is a decline in righteousness, O Bharata, and a rise of unrighteousness, then I manifest Myself. For the protection of the good, for the destruction of the wicked, and for the establishment of righteousness, I am born age after age."
गीता के मूल सिद्धांत
गीता के 18 अध्याय
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Arjuna Vishada Yoga
कुरुक्षेत्र के पवित्र धर्मक्षेत्र में दोनों सेनाओं के मध्य रथ खड़ा करवाकर अर्जुन जब अपने पूज्य पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, भ्राताओं और प्रिय संबंधियों को युद्ध हेतु तत्पर देखता है, तो उसका अंतःकरण तीव्र करुणा, मोह और शोक से व्याकुल हो जाता है। उसके हाथ से गांडीव धनुष फिसल जाता है, शरीर कांपने लगता है और वह युद्ध न करने का निर्णय लेकर विषादग्रस्त हो बैठ जाता है। यह मानवीय दुर्बलता, कर्तव्य-भ्रम और आत्मसमर्पण की प्रथम मनोवैज्ञानिक भूमिका है।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते॥ (1.29-30)
- ✨ मोह और आसक्ति मनुष्य को उसके स्वाभाविक कर्तव्य से भटकाती है
- ✨ अत्यधिक ममता में विवेक और न्याय-अन्याय का बोध लुप्त हो जाता है
- ✨ जीवन के चरम संकट में सच्चा शिष्य बनकर सद्गुरु की शरण आवश्यक है
Sankhya Yoga
गीता का अत्यंत महत्वपूर्ण व दार्शनिक आधार स्तम्भ। श्रीकृष्ण अर्जुन के विषाद को अज्ञानजनित बताते हुए आत्मतत्व का साक्षात्कार कराते हैं—आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है; जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नवीन वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा जीर्ण शरीरों को त्यागकर नवीन शरीर धारण करती है। इसके पश्चात भगवान 'निष्काम कर्मयोग' का उपदेश देते हैं और 'स्थितप्रज्ञ' (स्थिर बुद्धि वाले महापुरुष) के दिव्य लक्षणों का सविस्तार वर्णन करते हैं।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (2.47)
- ✨ शरीर नश्वर है, आत्मा शाश्वत, शुद्ध और परम अविनाशी है
- ✨ कर्म के परिणाम की व्यग्रता त्यागे बिना मन में सच्ची शांति असंभव है
- ✨ सुख-दुःख, मान-अपमान और लाभ-हानि में सम रहने वाला ही स्थितप्रज्ञ है
Karma Yoga
कर्म से पलायन संन्यास नहीं है। संसार में कोई भी प्राणी प्रकृति के गुणों के कारण एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि हाथ-पैर से कर्म छोड़ना और मन से विषयों का चिंतन करना मिथ्याचार (पाखंड) है। श्रेष्ठ महापुरुष जो-जो आचरण करते हैं, लोक उसी का अनुसरण करता है। यज्ञ रूपी सृष्टि चक्र का अनासक्त पालन, समाज कल्याण (लोकसंग्रह) हेतु सेवा और अंतःकरण में छिपे काम-क्रोध रूपी शत्रुओं का संहार ही कर्मयोग का यथार्थ सार है।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (3.21)
- ✨ कर्म का त्याग नहीं, वरन फल की स्वार्थपूर्ण आसक्ति का त्याग ही वास्तविक योग है
- ✨ समाज में उच्च पद पर आसीन व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह आदर्श आचरण प्रस्तुत करे
- ✨ रजोगुण से उत्पन्न काम और क्रोध ही आत्मा के सबसे घातक वैरी हैं
Jnana Karma Sanyasa Yoga
भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य जन्म और अलौकिक अवतार का सनातन रहस्य प्रकट करते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब वे साधु-संतों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना हेतु युग-युग में प्रकट होते हैं। भगवान कर्म, अकर्म और विकर्म का सूक्ष्म विवेक समझाते हैं तथा उद्घोष करते हैं कि ज्ञान रूपी प्रज्वलित अग्नि समस्त संचित कर्मबंधनों को भस्म कर देती है। श्रद्धावान और संयमी मनुष्य ही परम ज्ञान का सच्चा अधिकारी बनता है।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (4.7-8)
- ✨ भगवान के दिव्य जन्म और कर्म का तात्विक ज्ञान मनुष्य को भवबंधन से मुक्त करता है
- ✨ ज्ञान रूपी नौका द्वारा बड़े से बड़ा पापी भी संसार-सागर को सुगमता से पार कर लेता है
- ✨ 'श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्' — संशयग्रस्त मन का विनाश होता है, श्रद्धालु ही ज्ञान पाता है
Karma Sanyasa Yoga
कर्मसंन्यास (ज्ञान मार्ग) और कर्मयोग (निष्काम सेवा) दोनों का समन्वय। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्मयोग के बिना संन्यास सिद्ध होना अत्यंत कठिन है, जबकि निष्काम कर्मयोगी अनायास ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। जो पुरुष अपने समस्त कर्मों को परमात्मा में समर्पित कर अहंकाररहित आचरण करता है, वह जल में कमल के पत्ते की भांति संसार में रहकर भी कभी पाप-पुण्य के बंधनों से लिप्त नहीं होता। वह ज्ञानी ब्राह्मण, चांडाल, गौ और गज सबमें एक ही परमात्मा को देखता है।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (5.10)
- ✨ कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों का अंतिम फल एक ही परम मोक्ष है
- ✨ समदर्शी ज्ञानी पुरुष विद्या-विनय सम्पन्न ब्राह्मण, गौ, हाथी और चांडाल में एक सा ब्रह्म देखता है
- ✨ जिसकी दृष्टि अंतर्मुखी होकर आत्मसुख में लीन है, वही जीते-जी ब्रह्मनिर्वाण पाता है
Dhyana Yoga (Atma Samyama)
मन को एकाग्र और नियंत्रित करने की संपूर्ण वैज्ञानिक अष्टांग योग पद्धति। भगवान सिखाते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु। जिसने मन को जीत लिया, उसका मन परम मित्र है; जो मन के वशीभूत रहा, उसका मन शत्रु बनकर विनाश करता है। उचित आहार, विहार, निद्रा और अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा चंचल मन को परमात्मा में स्थिर किया जा सकता है। योगभ्रष्ट साधक के विषय में भगवान आश्वासन देते हैं कि कल्याणकारी मार्ग पर चलने वाले का कभी पतन नहीं होता।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ (6.5)
- ✨ अभ्यास और वैराग्य से वायु की भांति चंचल मन को भी निश्चित रूप से वश में किया जा सकता है
- ✨ अति भोजन, उपवास या अति जागरण नहीं—सम्यक और संतुलित जीवन ही योग का रहस्य है
- ✨ योगभ्रष्ट साधक अगले जन्म में पवित्र कुलों में जन्म लेकर पुनः वहीं से यात्रा प्रारंभ करता है
Jnana Vijnana Yoga
भगवान अपनी परा (चेतन आत्म-शक्ति) और अपरा (भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार) प्रकृतियों का उद्घाटन करते हैं। श्रीकृष्ण बताते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड में जल में रस, सूर्य-चंद्रमा में प्रभा, पृथ्वी में पवित्र गंध और वेदों में ओंकार स्वयं वही हैं। त्रिगुणमयी दैवी माया अत्यंत दुर्लंघ्य है, किंतु जो अनन्य भाव से भगवान की शरण में आते हैं, वे इस माया को सरलता से पार कर जाते हैं। भगवान चार प्रकार के भक्तों—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—का वर्णन करते हैं।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ (7.7)
- ✨ ईश्वर ही समस्त चराचर जगत का मूल उद्गम, संभरण और प्रलय स्थान है
- ✨ संसार को मोहित करने वाली त्रिगुणमयी माया को केवल पूर्ण शरणागति से ही पार किया जा सकता है
- ✨ 'उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' — ज्ञानी भक्त भगवान का साक्षात् आत्मा स्वरूप है
Akshara Brahma Yoga
अर्जुन के सात गंभीर दार्शनिक प्रश्नों—ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ और अंतकाल में ईश्वर की अनुभूति—का परम पावन समाधान। भगवान समझाते हैं कि अंतकाल में मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए देह त्याग करता है, उसी भाव को वह प्राप्त होता है। इसलिए जीवन भर 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च' का अभ्यास आवश्यक है। ओंकार साधना, प्राणायाम, शुक्ल-कृष्ण मार्गों और उस अविनाशी परम धाम का वर्णन है जहां पहुंचकर जीव कभी लौटकर संसार में नहीं आता।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ (8.5)
- ✨ जीवन भर का निरंतर सात्विक अभ्यास ही मृत्यु के समय भगवत्स्मरण को सहज बनाता है
- ✨ एकाक्षर ब्रह्म 'ॐ' का उच्चारण और मन को हृदय में निरुद्ध कर प्राण त्यागने वाला परम गति पाता है
- ✨ ब्रह्मलोक सहित समस्त लोक पुनरावर्ती हैं, किंतु परमात्मा के परम धाम से कभी पुनर्जन्म नहीं होता
Raja Vidya Raja Guhya Yoga
यह ज्ञान समस्त विद्याओं का राजा, परम गोपनीय, पवित्र, प्रत्यक्ष अनुभवगम्य और अविनाशी है। भगवान समझाते हैं कि वे किस प्रकार अव्यक्त रूप से संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं, फिर भी किसी में लिप्त नहीं हैं। भगवान उद्घोष करते हैं कि जो अनन्य भक्त केवल उनका ही चिंतन करते हुए निष्काम भजन करते हैं, उनके 'योगक्षेम' का भार भगवान स्वयं वहन करते हैं। पत्र, पुष्प, फल या जल—प्रेम से जो कुछ भी अर्पित किया जाए, भगवान उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (9.22)
- ✨ प्रेम और सच्ची निष्काम भक्ति बाह्य आडंबरों, कर्मकांडों और धन-बल से कहीं अधिक मूल्यवान है
- ✨ अनन्य शरणागत भक्त की भौतिक व आध्यात्मिक सभी आवश्यकताओं का दायित्व भगवान संभालते हैं
- ✨ 'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्' — पापी से पापी व्यक्ति भी अनन्य भक्ति से शीघ्र धर्मात्मा बन जाता है
Vibhuti Yoga
भगवान अपनी अलौकिक ब्रह्मांडीय विभूतियों का सविस्तार वर्णन करते हैं ताकि भक्त हर कण में परमात्मा का दर्शन कर सके। श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे समस्त भूतों के हृदय में स्थित आत्मा हैं। वे आदित्यों में विष्णु, ज्योतियों में सूर्य, वेदों में सामवेद, देवों में इंद्र, रुद्रों में शंकर, पर्वतों में मेरु, वृक्षों में पीपल, मुनियों में व्यास, योद्धाओं में राम, और समस्त चराचर जगत में जो कुछ भी ऐश्वर्यवान, कांतियुक्त, तेजस्वी अथवा शक्तिशाली है, वह सब उनके तेज के एक अंश से उत्पन्न हुआ है।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽंशसम्भवम्॥ (10.41)
- ✨ सृष्टि का प्रत्येक सौंदर्य, शक्ति, प्रतिभा और सामर्थ्य साक्षात् परमात्मा की ही दिव्य किरण है
- ✨ संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान के अनंत तेज के एक अत्यंत सूक्ष्म अंश मात्र से ही व्याप्त है
- ✨ इस विभूति-ज्ञान से मनुष्य का हृदय समस्त सृष्टि के प्रति आदर, श्रद्धा और प्रेम से भर जाता है
Vishwaroop Darshan Yoga
गीता का सर्वाधिक विस्मयकारी और भव्य अध्याय। अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान श्रीकृष्ण उसे दिव्य चक्षु प्रदान करते हैं और अपने अनंत, सर्वव्यापी, तेजोमय विश्वरूप का साक्षात् प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं। अर्जुन देखता है कि करोड़ों सूर्य-चंद्रमा, समस्त देवता, ऋषि, चर-अचर जीव और दोनों सेनाओं के योद्धा भगवान के प्रज्वलित मुखों में काल की भांति समाए जा रहे हैं। भय और विस्मय से कांपते हुए अर्जुन स्तुति करता है। भगवान कहते हैं—'निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्' (हे अर्जुन! तुम केवल निमित्तमात्र बनो)।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ (11.32)
- ✨ स्थूल भौतिक नेत्रों से विराट सत्य का दर्शन संभव नहीं, इसके लिए आध्यात्मिक दिव्य दृष्टि आवश्यक है
- ✨ काल के महाचक्र में सब कुछ पहले से नियत है, मनुष्य को केवल निमित्त बनकर धर्म का पालन करना चाहिए
- ✨ यह परम दुर्लभ विश्वरूप वेदों, तपस्या या दान से नहीं, केवल अनन्य प्रेम-भक्ति से ही सुलभ है
Bhakti Yoga
अर्जुन प्रश्न करता है कि सगुण साकार रूप की अनन्य उपासना करने वाले और अव्यक्त निराकार ब्रह्म की साधना करने वाले—इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है? श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि दोनों मोक्ष पाते हैं, किंतु देहाभिमानी जीवों के लिए अव्यक्त निराकार का मार्ग अत्यंत क्लेशप्रद है, जबकि सगुण भक्ति सुगम और आनंददायी है। अध्याय के उत्तरार्ध में भगवान अपने प्रिय भक्त के 35 दुर्लभ आंतरिक सद्गुणों की नामावली प्रस्तुत करते हैं—जो द्वेषरहित, दयालु, निर्मम, निरहंकार, सुख-दुःख में सम और संतुष्ट है, वह भगवान को अति प्रिय है।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ (12.13)
- ✨ सगुण प्रेम-भक्ति देहधारी मनुष्य के लिए निराकार साधना की तुलना में अत्यंत सुगम और स्वाभाविक है
- ✨ सच्ची भक्ति का मापदंड बाह्य प्रदर्शन नहीं, अपितु अंतःकरण की समता, अद्वेष और करुणा है
- ✨ परमात्मा को केवल वही भक्त प्रिय है जो समस्त सृष्टि से निष्काम और निस्वार्थ प्रेम करता है
Kshetra Kshetrajna Vibhaga
इस अध्याय में दार्शनिक विवेक का वैज्ञानिक निरूपण है। 'क्षेत्र' का अर्थ है यह 24 तत्वों वाला पंचमहाभूत देह, मन, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियां। 'क्षेत्रज्ञ' का अर्थ है इस देह को जानने वाला, इसके भीतर साक्षी रूप में विराजमान शाश्वत जीवात्मा। भगवान स्वयं को समस्त क्षेत्रों में एक ही परमात्मा (महाक्षेत्रज्ञ) घोषित करते हैं। अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुसेवा, पवित्रता, वैराग्य और अनन्य भक्ति—इन्हीं गुणों को 'ज्ञान' कहा गया है।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। (13.1-2)
- ✨ शरीर एक कर्मभूमि और साधन मात्र है, आत्मा उसका नित्य, अछूता दृष्टा और साक्षी है
- ✨ अहंकार, दंभ और हिंसा का समूल नाश ही वास्तविक आत्मज्ञान की प्रथम अनिवार्य पूर्व शर्त है
- ✨ आत्मा संपूर्ण देह में व्याप्त रहकर भी आकाश और सूर्य की भांति कभी अशुद्ध या विकृत नहीं होती
Gunatraya Vibhaga Yoga
प्रकृति के तीन मूल गुण—सत्व, रज और तम—जीवात्मा को इस नश्वर देह में बांधकर रखते हैं। सत्व गुण ज्ञान और सुख की आसक्ति से बांधता है; रजोगुण कामना, वासना और तृष्णा से कर्मों में लिप्त करता है; तथा तमोगुण अज्ञान, आलस्य और निद्रा द्वारा प्रमाद में ढकेलता है। श्रीकृष्ण इन तीनों गुणों के लक्षण, कार्य, मृत्यु उपरांत की गतियां और इनसे ऊपर उठकर 'गुणातीत' (तीनों गुणों से परे) बनने का साधन समझाते हैं। गुणातीत पुरुष मान-अपमान, मित्र-शत्रु और मिट्टी-स्वर्ण में समबुद्धि रहता है।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ (14.20)
- ✨ मानव मन की प्रत्येक भावना और विचार सत्व, रज या तम के प्रभाव से ही संचालित होते हैं
- ✨ सत्व गुण से ज्ञान और सुख, रज से लोभ व अशांति, और तम से अज्ञान व आलस्य उत्पन्न होता है
- ✨ अडिग भगवद्भक्ति और साक्षी भाव द्वारा ही इन तीनों गुणों के पार 'गुणातीत' हुआ जा सकता है
Purushottama Yoga
वेदों का संपूर्ण सार केवल बीस श्लोकों में संकलित। संसार की तुलना एक उलटे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष से की गई है, जिसकी जड़ें ऊपर परमात्मा में हैं और शाखाएं नीचे संसार में फैली हैं। इस संसार वृक्ष को दृढ़ 'असंग-शस्त्र' (वैराग्य रूपी कुल्हाड़े) से काटकर उस परम पद को खोजना चाहिए जहां पहुंचकर कोई लौटता नहीं। संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं—'क्षर' (समस्त नाशवान देह) और 'अक्षर' (कूटस्थ अविनाशी आत्मा)। किंतु इन दोनों से परे जो त्रिलोकी का भरण-पोषण करने वाला नित्य परमात्मा है, वही 'पुरुषोत्तम' है।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ (15.18)
- ✨ संसार रूपी वृक्ष की आसक्ति को केवल तीव्र वैराग्य और ईश्वर शरणागति से काटा जा सकता है
- ✨ परमात्मा ही जठराग्नि बनकर चार प्रकार के अन्नों को पचाता है और स्मृति-ज्ञान प्रदान करता है
- ✨ पुरुषोत्तम तत्व को समझ लेना ही संपूर्ण वैदिक ज्ञान और साधना की पराकाष्ठा है
Daivasura Sampad Vibhaga
मनुष्य के अंतःकरण में विद्यमान दो प्रवृत्तियों—दैवी संपदा और आसुरी संपदा—का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक व नैतिक विश्लेषण। अभय, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान-योग में स्थिति, दान, इंद्रिय-संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, शांति और क्षमा—ये 26 दैवी गुण मोक्ष और दिव्यता की ओर ले जाते हैं। दूसरी ओर दंभ, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान—ये आसुरी गुण बंधन और पतन का कारण बनते हैं। श्रीकृष्ण काम, क्रोध और लोभ को आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन द्वार बताते हैं।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ (16.21)
- ✨ चरित्र और सद्गुण ही मनुष्य को देवत्व या पतन की ओर अग्रसर करते हैं
- ✨ काम, क्रोध और लोभ—यह त्रिकुटी समस्त पापों, मानसिक तनावों और सर्वनाश की जननी है
- ✨ जीवन में क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसके लिए शास्त्र प्रमाण ही आदर्श मार्गदर्शक है
Shraddhatraya Vibhaga Yoga
अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण समझाते हैं कि मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण के संस्कारों के अनुरूप सात्विक, राजसिक या तामसिक होती है। इसी प्रकार भोजन, यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। सात्विक आहार आयु, बुद्धि, बल और आरोग्य बढ़ाता है; राजसिक आहार दुःख और रोग उत्पन्न करता है; तामसिक आहार दुर्गंधयुक्त और अशुद्ध होता है। इसी अध्याय में शरीर, वाणी और मन के सात्विक तप का निरूपण है, तथा समस्त क्रियाओं को दोषमुक्त और पवित्र बनाने वाले महामंत्र 'ॐ तत् सत्' का रहस्य उद्घाटित किया गया है।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥ (17.23)
- ✨ 'श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः' — मनुष्य जैसी श्रद्धा रखता है, वैसा ही उसका स्वरूप बनता है
- ✨ सत्य, प्रिय और हितकारी वाणी बोलना ही वाणी का सबसे बड़ा सात्विक तप (वाङ्मयं तप) है
- ✨ परमात्मा के निमित्त 'ॐ तत् सत्' का स्मरण कर निष्काम भाव से किया गया कर्म ही पवित्र होता है
Moksha Sanyasa Yoga
संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता का महामुकुट और उपसंहार अध्याय। त्याग और संन्यास के सूक्ष्म तात्विक भेद से अध्याय आरंभ होता है: काम्य कर्मों का त्याग 'संन्यास' है और कर्मफल की आसक्ति का त्याग 'त्याग' है। यज्ञ, दान और तप कभी नहीं त्यागने चाहिए, क्योंकि ये मनीषियों को भी पावन करते हैं। ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के सात्विक, राजसिक और तामसिक भेदों का असाधारण मनोवैज्ञानिक निरूपण है। चारों वर्णों के स्वाभाविक गुण और स्वधर्म पालन की अनिवार्यता बताते हुए श्रीकृष्ण शरणागति के चरम शिखर 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' का उद्घोष करते हैं।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ (18.65-66)
- ✨ फल की आसक्ति का त्याग ही सच्चा संन्यास है; कर्तव्य कर्म कभी नहीं छोड़ना चाहिए
- ✨ 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्' — अपने स्वधर्म का पालन करना परधर्म से कहीं अधिक कल्याणकारी है
- ✨ भगवान के चरणों में अनन्य आत्मसमर्पण ही भवसागर से मुक्ति का अंतिम और अचूक राजमार्ग है