भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व 2026
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व के इस विशेष लेख में जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और कथा। भगवान गणेश की कृपा से अपने सभी संकटों का नाश करें।
🙏 सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए 'भक्ति अमृत सनातन' के इस पावन मंच पर आप सभी का स्वागत है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हम 'भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी' के रूप में मनाते हैं। यह दिन प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश को समर्पित है, जो विघ्नहर्ता और मंगलमूर्ति हैं। कल, यानी 6 मार्च 2026 को, श्रद्धालु भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व का पालन करते हुए अपने जीवन के दुखों का अंत करेंगे।

भगवान गणेश का 'भालचंद्र' स्वरूप अत्यंत दिव्य है, जिसका अर्थ है 'वह जिसके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है'। इस व्रत को करने से न केवल मानसिक शांति प्राप्त होती है, बल्कि कुंडली के चंद्र दोष भी समाप्त हो जाते हैं। आइए, इस विस्तारपूर्ण स्तंभ लेख के माध्यम से भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व को गहराई से समझते हैं। 🙏
🌺 भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व का आध्यात्मिक आधार 🌺
सनातन शास्त्रों के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का अर्थ ही है 'संकटों को हरने वाली चतुर्थी'। जब हम भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व की बात करते हैं, तो इसका सीधा संबंध भगवान गणेश द्वारा चंद्रमा को दिए गए आशीर्वाद से जुड़ता है। गणेश जी ने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण कर उन्हें क्षय रोग से मुक्ति दिलाई थी।
शास्त्रों में वर्णित श्लोक:
*गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जंबू फलचारु भक्षणम्।*
*उमासुतं शोक विनाशकारकं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्॥*
हिंदी अनुवाद: हाथी के समान मुख वाले, भूत-प्रेत आदि गणों द्वारा सेवित, कैथ और जामुन के फलों का भक्षण करने वाले, माता पार्वती के पुत्र और दुखों का विनाश करने वाले विघ्नेश्वर भगवान गणेश के चरण कमलों में मैं प्रणाम करता हूँ।
इस श्लोक का गान करते हुए जब भक्त भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व का अनुसरण करते हैं, तो उनके जीवन से अंधकार स्वतः ही मिटने लगता है। 🌟
🪔 संकष्टी चतुर्थी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि 🪔
वर्ष 2026 में चैत्र कृष्ण चतुर्थी तिथि का प्रारंभ और समापन अत्यंत महत्वपूर्ण है। सटीक गणना के अनुसार:
🌸 चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 5 मार्च 2026, देर रात्रि।
🌸 चतुर्थी तिथि समाप्त: 6 मार्च 2026, रात्रि तक।
🌸 चंद्रोदय का समय: रात्रि 09:15 बजे (स्थान के अनुसार परिवर्तन संभव)।
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व में चंद्र दर्शन का विशेष स्थान है। बिना चंद्रमा को अर्घ्य दिए यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है। 🌙
🌺 भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और पूजन प्रक्रिया 🌺
यदि आप इस पावन दिन पर भगवान गणेश को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व के अनुसार निम्नलिखित चरणों का पालन करें:
🌟 ब्रह्म मुहूर्त में जागरण: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और लाल रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
🌟 संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें कि आप अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु यह उपवास रख रहे हैं।
🌟 वेदी स्थापना: एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
🌟 अभिषेक: गणेश जी को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं।
🌟 श्रृंगार: उन्हें सिंदूर, दूर्वा (21 गांठें), लाल फूल और अक्षत अर्पित करें।
🌟 नैवेद्य: भगवान को मोदक या बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं।
📌 विशेष नोट: भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और महत्व में 'दूर्वा' का अर्पण सबसे अनिवार्य माना गया है। दूर्वा की कोमलता गणेश जी के सौम्य स्वभाव को दर्शाती है। 🌼