होली एवं होलिका दहन: प्रह्लाद की भक्ति, वसंतोत्सव, वैज्ञानिक रहस्य और पूजन विधि
फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली (Holi) सनातन धर्म का वह पावन रंगोत्सव है, जो भक्ति की शक्ति, अहंकार के विनाश और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में होलिका दहन होता है और अगले दिन धुलेंडी पर रंगों का उत्सव मनाया जाता है।
भक्त प्रह्लाद और होलिका दहन की पावन कथा
दैत्यराज हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान घोषित कर चुका था और उसने अपनी प्रजा को भगवान विष्णु की पूजा करने पर कठोर दंड देने का आदेश दिया था। किंतु उसका अपना पुत्र भक्त प्रह्लाद जन्म से ही अनन्य नारायण भक्त था। जब हिरण्यकश्यप के समस्त प्रहार प्रह्लाद को विचलित न कर सके, तब उसने अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था) को प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठने का आदेश दिया।
प्रह्लाद नारायण नाम का जप करते रहे। ईश्वर की लीला से वायु चली, होलिका की ओढ़नी उड़कर प्रह्लाद पर आ गई और अहंकार में चूर होलिका भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ। यह कथा सिद्ध करती है कि ईश्वर सदैव अपने अनन्य शरणागत भक्त की रक्षा करते हैं।
होलिका दहन का वैज्ञानिक एवं स्वास्थ्य महत्व
- शीतकाल की समाप्ति और ग्रीष्मकाल के आगमन के संधिकाल में वातावरण में हानिकारक जीवाणु (Bacteria) पनपते हैं। होलिका की प्रचंड अग्नि से 50-60 डिग्री तक का तापमान आसपास के वातावरण को शुद्ध और रोगाणुमुक्त करता है।
- होलिका में गेहूं की नई बालियां (होला) भूनकर प्रसाद रूप में खाई जाती हैं, जिससे कफ का शमन होता है।
- पारंपरिक रूप से पलाश (टेसू) के फूलों, नीम, हल्दी और चंदन के प्राकृतिक रंगों से होली खेली जाती थी, जो त्वचा के रोगों को दूर करते थे।