श्री हनुमान पावन चरित्र: जन्म रहस्य, बाललीला, सुग्रीव-राम मिलन और लंका दहन

श्री हनुमान पावन चरित्र: जन्म रहस्य, बाललीला, सुग्रीव-राम मिलन और लंका दहन

सनातन धर्म में श्री हनुमान जी असीम बल, पराक्रम, बुद्धि, विद्या और अनन्य दास्य भक्ति के साक्षात विग्रह हैं। वे भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार माने जाते हैं, जिनका प्राकट्य त्रेतायुग में प्रभु श्री राम के काज संवारने हेतु हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा है—"कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं तात तात तुम पाहीं॥" हनुमान जी का चरित्र निष्काम सेवा और निरहंकारिता का सर्वोच्च शिखर है।

कथा का परिचय एवं मुख्य पात्र

श्री हनुमान कथाएं शक्ति के सदुपयोग और समर्पण का पावन संगम हैं। इन कथाओं के मुख्य पात्र हैं:

  • श्री हनुमान (बजरंगबली): पवनपुत्र, अंजनीनंदन, संकटमोचन
  • माता अंजना एवं केसरी: हनुमान जी के माता-पिता
  • प्रभु श्री राम एवं लक्ष्मण: आराध्य देव
  • सुग्रीव एवं जामवंत: किष्किंधा के वानर राज व मार्गदर्शक
  • माता सीता एवं विभीषण: लंका में भक्ति के आलोक

1. जन्म रहस्य और बाललीला: सूर्य को फल समझना

माता अंजना और वानरराज केसरी के घर भगवान शिव के रुद्र तेज से पवनदेव के माध्यम से हनुमान जी का प्राकट्य हुआ। बाल्यकाल से ही वे असीम शक्ति और कौतुक से परिपूर्ण थे।

एक प्रातः जब बालक हनुमान को भूख लगी, तो उन्होंने आकाश में उदित होते हुए लाल सूर्य को एक मीठा, पका हुआ लाल फल समझ लिया। वे खेल-खेल में ही सूर्य को पकड़ने के लिए आकाश मार्ग में तीव्र गति से उड़ चले। उसी दिन सूर्य पर राहु का ग्रहण लगने वाला था, किंतु बालक हनुमान के तेज को देखकर राहु भयभीत होकर देवराज इंद्र के पास पहुंचा।

इंद्र ने ऐरावत पर सवार होकर बालक को रोकने का प्रयास किया, किंतु हनुमान जी ने ऐरावत को भी क्रीड़ा का साधन समझ लिया। क्रोधित होकर इंद्र ने बालक पर अपने वज्र से प्रहार कर दिया। वज्र के आघात से बालक की बाईं हनु (ठोड़ी) टूट गई और वे मूर्छित होकर पर्वत पर गिर पड़े। तभी से उनका नाम 'हनुमान' पड़ा।

अपने पुत्र पर वज्र का प्रहार देखकर पवनदेव अत्यंत कुपित हो गए और उन्होंने संपूर्ण सृष्टि में वायु का संचार रोक दिया। वायु रुकने से त्राहि-त्राहि मच गई। तब ब्रह्मा जी सहित समस्त देवताओं ने वहां पहुंचकर बालक को स्पर्श कर स्वस्थ किया और वरदानों की वर्षा कर दी—इंद्र ने वज्र से अभेद्य होने का, ब्रह्मा जी ने अजर-अमरता का, सूर्य ने अपने तेज का अंश और समस्त शास्त्रों का ज्ञान, तथा वरुण व यम ने कभी पराजित न होने का वरदान दिया।

2. ऋष्यमूक पर्वत पर प्रभु राम से प्रथम मिलन

सीता हरण के पश्चात जब श्री राम और लक्ष्मण जी वन-वन भटकते हुए ऋष्यमूक पर्वत के निकट पहुंचे, तो पर्वत पर स्थित वानरराज सुग्रीव ने दो तेजस्वी राजकुमारों को धनुष-बाण लिए देखकर शंका व्यक्त की कि कहीं ये बालि के भेजे गुप्तचर तो नहीं। सुग्रीव ने हनुमान जी को उनका वास्तविक भेद जानने भेजा।

हनुमान जी एक ब्राह्मण (विप्र) का रूप धारण कर प्रभु राम के सम्मुख उपस्थित हुए और मधुर वाणी में पूछा—"को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्रिय रूप फिरहु बन बीरा॥" जब भगवान राम ने अपना परिचय दिया, तो हनुमान जी ने अपने प्रभु को पहचान लिया। वे तुरंत ब्राह्मण वेश त्यागकर प्रभु राम के चरणों में गिर पड़े।

हनुमान जी ने सजल नेत्रों से कहा—"प्रभु! मैं तो अज्ञानी जीव हूँ, माया के वश में था, इसलिए नहीं पहचान सका। किंतु आपने मुझे कैसे भुला दिया?" प्रभु राम ने हनुमान जी को हृदय से लगा लिया और कहा—"हे कपि! तुम मुझे लक्ष्मण के समान ही प्रिय हो।" इसके बाद हनुमान जी ने प्रभु को अपने कंधों पर बैठाकर सुग्रीव से मिलाया और अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की मित्रता कराई।

3. समुद्र उल्लंघन और लंका दहन

सीता जी की खोज में जब वानर सेना दक्षिण समुद्र तट पर पहुंची, तो सौ योजन (400 कोस) फैले अथाह सागर को पार करने का संकट उपस्थित हुआ। जामवंत जी ने हनुमान जी को उनके सुप्त बल और पराक्रम का स्मरण कराया—"राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥"

हनुमान जी ने एक विशाल पर्वत के समान रूप धारण किया और एक ही छलांग में समुद्र को लांघ दिया। मार्ग में सुरसा की परीक्षा को सूक्ष्म रूप धारण कर उत्तीर्ण किया और छाया पकड़ने वाली सिंहिका का वध किया। लंका पहुंचकर विभीषण से भेंट की और अशोक वाटिका में शोकग्रस्त माता सीता को प्रभु राम की मुद्रिका (अंगूठी) देकर उनका संताप दूर किया।

अशोक वाटिका को उजाड़कर और अक्षय कुमार का वध कर जब वे मेघनाद के ब्रह्मास्त्र के सम्मान में बंदी बने, तो रावण की सभा में निर्भीक होकर धर्म का उपदेश दिया। रावण ने जब उनकी पूंछ में आग लगवाई, तो पवनपुत्र ने उस अग्नि से संपूर्ण पापी लंका नगरी को जलाकर भस्म कर दिया और पुनः समुद्र पार कर प्रभु राम को माता सीता का चूड़ामणि संदेश दिया।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

हनुमान जी का संपूर्ण चरित्र वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड व सुंदरकांड, श्रीरामचरितमानस, आनंद रामायण, तथा शिव पुराण (शतरुद्र संहिता) में विस्तृत रूप से अंकित है।

कथाओं का आध्यात्मिक मर्म

हनुमान जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे असीम शक्ति और अष्टसिद्धि-नवनिधि के स्वामी होते हुए भी स्वयं को सदैव 'राम का दास' मानते हैं। उन्होंने कभी अपने बल का अहंकार नहीं किया। लंका दहन के बाद जब प्रभु राम ने प्रशंसा की, तो उन्होंने सारा श्रेय प्रभु की कृपा को दे दिया। यह चरित्र सिखाता है कि सच्ची शक्ति निरहंकारिता और सेवा में ही समाहित है।

आज के जीवन के लिए सीख

  • निस्वार्थ सेवा: कार्य कितना भी बड़ा हो, समर्पण भाव से करने पर सफलता अवश्य मिलती है।
  • वाणी का संयम: हनुमान जी को 'नवव्याकरणवेत्ता' कहा गया है; उनकी वाणी सदैव संयमित और हितकारी होती है।
  • संकट में धैर्य: कठिन से कठिन परिस्थिति में भी विवेक और ईश्वर-विश्वास नहीं खोना चाहिए।

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