श्री सत्यनारायण व्रत एवं पूजा विधि: संपूर्ण नियम, पंचामृत प्रसाद और कथा महत्व
स्कंद पुराण के रेवाखंड में वर्णित श्री सत्यनारायण व्रत (Satyanarayan Vrat) कलियुग में मनुष्य के समस्त दुःखों के निवारण और मनोकामना पूर्ति का सबसे सरल और प्रभावशाली व्रत है। पूर्णिमा, संक्रांति अथवा किसी भी शुभ कार्य के अवसर पर यह कथा की जाती है।
विशेष महाप्रसाद (पंजीरी एवं पंचामृत)
- पंजीरी: गेहूं के आटे को शुद्ध घी में भूनकर उसमें शक्कर, भुने मखाने, चिरौंजी और तुलसी दल मिलाकर बनाई जाती है।
- पंचामृत: गाय का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल मिलाकर पंचामृत बनाएं।
- फल: केले (कदली फल) का भोग अनिवार्य माना गया है।
पूजा मंडप एवं विधि विधान
- केले के चार खंभों से पूजा मंडप तैयार करें और चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं।
- कलश स्थापना करें और उस पर श्री सत्यनारायण भगवान (शालिग्राम अथवा चित्र) को स्थापित करें।
- गणेश, गौरी, वरुण, नवग्रह और अष्टदिक्पालों का आवाहन और षोडशोपचार पूजन करें।
- भगवान सत्यनारायण को पंचामृत से स्नान कराएं और पीत वस्त्र व तुलसी मंजरी अर्पित करें।
- सत्यनारायण व्रत की पांचों अध्यायों की पावन कथा का एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें।
- हवन, आरती, और शंख ध्वनि के पश्चात उपस्थित सभी भक्तों में चरणामृत और प्रसाद वितरित करें।