रक्षा बंधन महापर्व: वैदिक रक्षासूत्र विधान, यम-यमुना एवं इंद्राणी की पावन कथा
श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षा बंधन (Raksha Bandhan) केवल भाई-बहन के अटूट स्नेह का पर्व नहीं, बल्कि एक अत्यंत प्राचीन वैदिक रक्षा विधान है। इसी दिन उपाकर्म (श्रावणी पूर्णिमा पर ऋषियों का तर्पण और नया जनेऊ धारण करने का पर्व) भी संपन्न होता है।
वैदिक रक्षासूत्र मंत्र और उसका रहस्य
रक्षासूत्र (राखी) बांधते समय इस वैदिक मंत्र का उच्चारण किया जाता है:
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
अर्थ: जिस रक्षासूत्र से महाबली दानवराज बलि को बांधा गया था, उसी पवित्र रक्षासूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अपने कर्तव्य से कभी विचलित न होना और सदैव इसकी रक्षा करना।
रक्षा बंधन की प्रमुख पौराणिक कथाएं
- यमराज और यमुना जी: श्रावण पूर्णिमा को यमुना जी ने अपने भाई यमराज को रक्षासूत्र बांधा और मिष्ठान्न खिलाया। प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो भाई अपनी बहन से रक्षासूत्र बंधवाएगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।
- इंद्राणी और देवराज इंद्र: देवासुर संग्राम में जब असुरों का पलड़ा भारी हो रहा था, तब देवगुरु बृहस्पति के निर्देश पर शची (इंद्राणी) ने वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षासूत्र इंद्र की कलाई पर बांधा, जिससे देवताओं की विजय हुई।
- माता लक्ष्मी और राजा बलि: पाताल लोक में भगवान विष्णु को राजा बलि के पहरे से मुक्त कराने के लिए माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधकर भाई बनाया और उपहार में श्री हरि विष्णु को मांग लिया।