नवरात्रि महापर्व: चैत्र व शारदीय नवरात्रि, नवदुर्गा के 9 दिव्य स्वरूप, कलश स्थापना और कन्या पूजन
नवरात्रि (Navratri) सनातन संस्कृति का वह दिव्य आध्यात्मिक कालखंड है, जब प्रकृति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने चरम पर होती है। वर्ष में चार नवरात्रियां होती हैं (चैत्र, शारदीय और दो गुप्त नवरात्रियां)। नौ दिनों तक माँ दुर्गा के 9 विशिष्ट स्वरूपों की आराधना से साधक के समस्त चक्र जाग्रत होते हैं।
नवदुर्गा के 9 दिव्य स्वरूप और उनका फल
- प्रथमं शैलपुत्री: पर्वतराज हिमालय की पुत्री, मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री, स्थिरता और भक्ति की प्रदाता।
- द्वितीयं ब्रह्मचारिणी: कठोर तपस्या करने वाली, स्वाधिष्ठान चक्र, तप, त्याग और संयम की देवी।
- तृतीयं चंद्रघंटा: मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र, मणिपूर चक्र, साहस, शौर्य और शांति प्रदाता।
- चतुर्थं कूष्माण्डा: अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली, अनाहत चक्र, आरोग्य और आयु प्रदाता।
- पंचमं स्कंदमाता: भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता, विशुद्ध चक्र, वात्सल्य और ज्ञान की अधिष्ठात्री।
- षष्ठं कात्यायनी: महर्षि कात्यायन की पुत्री, आज्ञा चक्र, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदाता।
- सप्तमं कालरात्रि: अंधकार और काल का नाश करने वाली भयंकर किंतु शुभ फलदायी (शुभंकरी), सहस्रार चक्र, निर्भयता प्रदाता।
- अष्टमं महागौरी: अत्यंत गौर वर्ण, शिवप्रिया, समस्त पापों का प्रक्षालन कर अखंड सौभाग्य देने वाली।
- नवमं सिद्धिदात्री: समस्त आठों सिद्धियों और नौ निधियों की दात्री, पूर्णता और मोक्ष प्रदाता।
कन्या पूजन (कंजक) का विधान
अष्टमी और नवमी के दिन 2 से 10 वर्ष की 9 कन्याओं को साक्षात नवदुर्गा मानकर उनके चरण धोए जाते हैं, कुमकुम का तिलक लगाया जाता है, और हलवा-पूरी व चने का भोग लगाकर उपहार दिया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, कन्या पूजन के बिना नवरात्रि व्रत का फल पूर्ण नहीं होता।