देवगुरु बृहस्पति व्रत कथा: विधि, नियम, पीत पूजन एवं सुख-समृद्धि का महामार्ग
गुरुवार का दिन देवताओं के गुरु देवगुरु बृहस्पति (Lord Brihaspati) और जगतपालक भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है। देवगुरु बृहस्पति ज्ञान, विद्या, धर्म, वैवाहिक सुख, धन और संतान के कारक ग्रह हैं। गुरुवार का व्रत रखने से कुंडली में गुरु ग्रह बलवान होता है और जीवन के समस्त अभाव दूर होते हैं।
बृहस्पतिवार व्रत की पावन कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक प्रतापी राजा था जिसके घर में अकूत धन-संपत्ति थी। उसकी रानी अत्यंत कृपण और कठोर स्वभाव की थी। वह किसी भी भिक्षुक या साधु को दान नहीं देती थी। एक दिन साक्षात देवगुरु बृहस्पति साधु वेश में भिक्षा मांगने आए। रानी ने कहा—"हे साधु! मुझे ऐसा उपाय बताएं जिससे यह सारा धन समाप्त हो जाए और मुझे किसी को दान न देना पड़े।"
साधु वेशधारी गुरुदेव ने कहा—"यदि ऐसा चाहती हो, तो गुरुवार को पूरे घर को गोबर से लीपना, सिर धोकर नहाना, पुरुषों से दाढ़ी-बाल कटवाना, कपड़े धोना और सायंकाल में अंधेरा रखना।" रानी ने ऐसा ही किया। सातवें गुरुवार तक राजा का सारा खजाना खाली हो गया और राजा-रानी दाने-दाने को तरसने लगे।
जब रानी को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ, तो उसने पुनः साधु से क्षमा मांगी। देवगुरु ने उसे 16 गुरुवार तक पीले वस्त्र पहनकर, चने की दाल, गुड़ और हल्दी से केले के वृक्ष और भगवान विष्णु का पूजन करने का निर्देश दिया। रानी के श्रद्धापूर्वक व्रत करने से पुनः उसका खोया हुआ वैभव और सुख-समृद्धि लौट आई।
गुरुवार व्रत के शास्त्रोक्त नियम
- गुरुवार के दिन साबुन लगाकर कपड़े धोना, बाल काटना, शेविंग करना और नाखून काटना वर्जित माना गया है।
- केले के वृक्ष की जड़ में जल, हल्दी, चने की दाल और गुड़ अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं।
- भोजन में नमक का त्याग करें और केवल एक समय पीला भोजन (बेसन का हलवा, कढ़ी या पीले फल) ग्रहण करें।
- 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः' मंत्र का 108 बार जप करें।