श्री गणेश चतुर्थी: 10 दिवसीय गणेशोत्सव, पार्थिव गणपति स्थापना, मोदक भोग और विसर्जन
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) का पावन पर्व मनाया जाता है। इसी दिन माता पार्वती ने अपने उबटन से बालक गणेश का निर्माण कर उसमें प्राण प्रतिष्ठा की थी। यह पर्व 10 दिनों तक पूरे भारत और विश्व में असीम भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
पार्थिव गणपति स्थापना का विशेष महत्व
शास्त्रों में मिट्टी (पार्थिव) के श्री गणेश बनाकर पूजा करने का सर्वोत्तम फल बताया गया है:
- शुद्ध नदी की बालू या तालाब की चिकनी मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाएं।
- मध्याह्न काल (दोपहर के समय) गणेश जी का प्राकट्य हुआ था, अतः स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा सदैव मध्याह्न काल में ही करनी चाहिए।
- गणेश जी के सम्मुख कलश स्थापित करें और 21 दुर्वांकुर, शमी पत्र और सिंदूर अर्पित करें।
- प्रतिदिन प्रातः और संध्या समय 'जय गणेश जय गणेश देवा' आरती गाएं और 21 मोदकों का भोग लगाएं।
अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन का तत्व दर्शन
10 दिनों की सेवा के पश्चात अनंत चतुर्दशी के दिन गाजे-बाजे के साथ 'गणपति बप्पा मोरया, पुढ़च्या वर्षी लौकर या' के जयघोष के साथ गणेश प्रतिमा का जल में विसर्जन किया जाता है। इसका आध्यात्मिक संदेश है कि जिस प्रकार मिट्टी की देह पंचतत्व से उत्पन्न होकर अंत में पंचतत्व में विलीन हो जाती है, किंतु आत्मतत्व सदैव अमर रहता है; वैसे ही परमात्मा रूप में प्रकट होकर पुनः निराकार ब्रह्म में समाहित होते हैं।