एकादशी व्रत: 24 एकादशियों का महत्व, संपूर्ण नियम, पारण विधि और पौराणिक कथा
सनातन धर्म के समस्त व्रतों में एकादशी व्रत (Ekadashi Vrat) को 'व्रतराज' (व्रतों का राजा) कहा गया है। पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, एकादशी का उपवास रखने से समस्त पापों का क्षय होता है और अंत में जीवात्मा को वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।
वर्ष भर की 24 एकादशियों का चक्र
प्रत्येक मास में दो पक्ष (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) होते हैं और प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। एक वर्ष में सामान्यतः 24 एकादशियां होती हैं और मलमास (अधिकमास) होने पर इनकी संख्या 26 हो जाती है:
- निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल): बिना जल ग्रहण किए रखा जाने वाला सबसे कठोर व्रत, जिससे वर्ष भर की समस्त 24 एकादशियों का फल प्राप्त हो जाता है।
- देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल): इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं (चातुर्मास आरंभ)।
- देवउठनी/प्रबोधिनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल): भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं और तुलसी विवाह व समस्त मांगलिक कार्य प्रारंभ होते हैं।
- मोक्षदा एकादशी (मार्गशीर्ष शुक्ल): इसी पावन तिथि पर कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था (गीता जयंती)।
एकादशी व्रत के कड़े शास्त्रोक्त नियम
- दशमी के नियम: दशमी तिथि की सायंकाल से ही सात्विक भोजन ग्रहण करें और प्याज, लहसुन, मसूर की दाल तथा पराया अन्न त्याग दें।
- चावल का सर्वथा निषेध: एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के मांस खाने के समान घोर पाप माना गया है। अतः घर में किसी को भी चावल नहीं पकाना चाहिए।
- द्वादशी पारण नियम: एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व और 'हरिवासर' (द्वादशी की प्रथम चौथाई अवधि) बीतने के बाद ही किया जाता है। पारण में तुलसी दल और भगवान का चरणामृत लेकर व्रत खोलें।