श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 (राजविद्या राजगुह्य योग): परम गोपनीय ज्ञान, योगक्षेमं वहाम्यहम् एवं पत्रं पुष्पं फलं तोयम्
श्रीमद्भगवद्गीता का नवम अध्याय 'राजविद्या राजगुह्य योग' (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) समस्त विद्याओं का राजा, समस्त रहस्यों का राजा, परम पवित्र और प्रत्यक्ष अनुभव योग्य ज्ञान है। इसमें 34 श्लोक हैं। भगवान श्रीकृष्ण इसमें अपनी असीम ऐश्वर्य शक्ति और शरणागति का परम वचन देते हैं।
1. भगवान की अमर प्रतिज्ञा: 'योगक्षेमं वहाम्यहम्'
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (9.22)
अर्थ: जो अनन्य भक्त केवल मेरा ही निरंतर चिंतन करते हुए निष्काम भाव से मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य युक्त भक्तों की जो आवश्यकताएं अप्राप्त हैं उन्हें मैं प्राप्त कराता हूँ (योग) और जो प्राप्त हैं उनकी सदा रक्षा करता हूँ (क्षेम)।
2. भक्ति की सरलता: 'पत्रं पुष्पं फलं तोयम्'
ईश्वर को किसी बहुमूल्य वस्तु, स्वर्ण या धन की आवश्यकता नहीं है। भगवान केवल प्रेम और भाव के भूखे हैं:
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥" (9.26)
(जो कोई भक्त प्रेमपूर्वक मुझे एक पत्ता, एक पुष्प, एक फल अथवा केवल जल भी अर्पित करता है, उस शुद्ध अंतःकरण वाले भक्त के प्रेममय उपहार को मैं साक्षात प्रकट होकर स्वीकार करता हूँ।)
3. जीवन का समर्पण सूत्र
श्रीकृष्ण कहते हैं कि तू जो कुछ खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मुझे अर्पित कर दे (यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्)। ऐसा करने से तू कर्मों के शुभ और अशुभ फल रूपी बंधनों से सर्वथा मुक्त होकर मुझे ही प्राप्त होगा।