श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 (आत्मसंयम / ध्यान योग): मन को वश में करने की विधि, आसन और योगी की दिनचर्या
श्रीमद्भगवद्गीता का षष्ठ अध्याय 'आत्मसंयम योग' अथवा 'ध्यान योग' (Dhyana Yoga) अष्टांग योग, एकाग्रता और मन के निग्रह की प्रायोगिक विधि है। इसमें 47 श्लोक हैं। यह अध्याय हर उस व्यक्ति के लिए प्रकाश स्तंभ है जो मानसिक अशांति, तनाव और चंचल मन से संघर्ष कर रहा है।
1. मन: मित्र अथवा सबसे बड़ा शत्रु
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ (6.5)
अर्थ: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न होने दे; क्योंकि जीवात्मा स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है। जिसने अपने मन को जीत लिया, उसका मन उसका सबसे बड़ा मित्र है; किंतु जो मन को वश में नहीं कर सका, उसके लिए मन शत्रु के समान आचरण करता है।
2. ध्यान की सही आसन विधि और दिनचर्या
- पवित्र स्थान पर न अत्यधिक ऊंचा और न अत्यधिक नीचा आसन लगाएं (कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछाकर)।
- काया, सिर और गर्दन को सीधा और अचल रखकर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करें।
- आहार-विहार का संतुलन: योग न तो बहुत अधिक खाने वाले को सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले को; न बहुत सोने वाले को और न सदा जागने वाले को। 'युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु'—संतुलित जीवन ही योग का आधार है।
3. चंचल मन को वश में करने का उपाय: अभ्यास और वैराग्य
अर्जुन ने प्रश्न किया कि हे कृष्ण! यह मन वायु की भांति अत्यंत चंचल, हठी और बलवान है, इसे रोकना वायु को मुट्ठी में बांधने के समान दुष्कर है। श्रीकृष्ण ने समाधान दिया:
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥" (6.35)
(हे महाबाहो! इसमें कोई संदेह नहीं कि मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; किंतु निरंतर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है।)