श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 (कर्म योग): निष्काम सेवा, यज्ञ चक्र और काम-क्रोध पर विजय
श्रीमद्भगवद्गीता का तृतीय अध्याय 'कर्म योग' (Karma Yoga) कर्म की श्रेष्ठता और सामाजिक व्यवस्था का वैज्ञानिक निरूपण है। इसमें 43 श्लोक हैं। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इस संसार में कोई भी प्राणी एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता।
1. संन्यास बनाम कर्मयोग
अर्जुन पूछता है कि हे जनार्दन! यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो आप मुझे इस घोर युद्ध रूपी कर्म में क्यों झोंक रहे हैं? श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि केवल कर्मों का त्याग करने (संन्यास लेने) से सिद्धि नहीं मिलती। हाथ-पैर से कर्म छोड़ देना और मन से विषयों का चिंतन करते रहना पाखंड (मिथ्याचार) है। सच्चा संन्यासी वह है जो समाज में रहते हुए, फल की आसक्ति से मुक्त होकर लोककल्याण (लोकसंग्रह) हेतु कर्म करता है।
2. ब्रह्मांडीय यज्ञ चक्र (The Cycle of Sacrifice)
श्रीकृष्ण यज्ञ का सिद्धांत समझाते हैं: अन्न से प्रजा उत्पन्न होती है, वर्षा से अन्न होता है, यज्ञ से वर्षा होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है। जो व्यक्ति इस ईश्वरीय चक्र का पालन न करके केवल अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए भोजन पकाता और खाता है, वह पापी है और केवल पाप खाता है (भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्)।
3. सबसे बड़ा शत्रु: काम और क्रोध
अर्जुन पूछता है कि मनुष्य न चाहते हुए भी किससे प्रेरित होकर पाप कर्म करता है? श्रीकृष्ण बताते हैं:
"काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥" (3.37)
रजोगुण से उत्पन्न होने वाला काम (वासना) ही बाद में क्रोध में बदलता है। यह महापापी और कभी न तृप्त होने वाली अग्नि के समान है। इंद्रियों को वश में करके बुद्धि को आत्मा में स्थिर कर इस वैरी को नष्ट करो।