श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 (सांख्य योग): आत्मा की अमरता, कर्मण्येवाधिकारस्ते एवं स्थितप्रज्ञ के लक्षण
श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय 'सांख्य योग' (Sankhya Yoga) संपूर्ण गीता का सारभूत अध्याय है। इसमें 72 श्लोक हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा के अविनाशी स्वरूप का ज्ञान देते हैं, निष्काम कर्म का रहस्य समझाते हैं और एक संतुलित व शांत पुरुष ('स्थितप्रज्ञ') के लक्षण बताते हैं।
1. आत्मा की अमरता और देह की नश्वरता
श्रीकृष्ण अर्जुन को डांटते हुए कहते हैं कि तू उनके लिए शोक करता है जो शोक करने योग्य नहीं हैं:
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ (2.23)
अर्थ: इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल इसे गीला कर सकता है और न वायु इसे सुखा सकती है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर और सनातन है।
जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र ग्रहण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है (वासांसि जीर्णानि यथा विहाय)। अतः शरीर की मृत्यु पर शोक करना अज्ञान है।
2. निष्काम कर्म का महासिद्धांत
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (2.47)
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। अतः तुम कर्मफल के प्रेरक मत बनो और न ही तुम्हारी अकर्मण्यता (आलस्य) में आसक्ति हो। योगस्थ होकर समभाव से कर्म करो, क्योंकि समत्व ही योग कहलाता है (समत्वं योग उच्यते)।
3. स्थितप्रज्ञ के लक्षण (The Enlightened Being)
अर्जुन के पूछने पर कि स्थितप्रज्ञ कैसा बोलता है, कैसा बैठता है और कैसा चलता है, श्रीकृष्ण ने समझाया कि जो व्यक्ति समस्त सांसारिक कामनाओं को त्यागकर अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, दुःख में उद्विग्न नहीं होता और सुख में लिप्त नहीं होता, जिसकी इंद्रियां कछुए के अंगों की भांति उसके वश में होती हैं, वही महापुरुष 'स्थितप्रज्ञ' कहलाता है।