श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग): सर्वधर्मान्परित्यज्य, अठारह अध्यायों का उपसंहार एवं विजय उद्घोष
श्रीमद्भगवद्गीता का अष्टादश अध्याय 'मोक्ष संन्यास योग' (Moksha Sanyasa Yoga) संपूर्ण गीता का उपसंहार और परम शिखर है। इसमें 78 श्लोक हैं। इसमें त्याग और संन्यास का भेद, तीन प्रकार के ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृति का विश्लेषण करने के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण अपना चरम और गोपनीयतम उपदेश देते हैं।
1. गीता का चरम महामंत्र: सर्वधर्मान्परित्यज्य
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (18.66)
अर्थ: समस्त सांसारिक धर्मों, कर्तव्यों और आश्रयों का अभिमान त्यागकर केवल एक मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा, तुम शोक मत करो।
2. अर्जुन का संशय नाश और समर्पण
भगवान के इस विराट ज्ञान का श्रवण कर अर्जुन के समस्त अज्ञान के आवरण छिन्न-भिन्न हो गए। अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा:
"नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥" (18.73)
(हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे आत्मस्मृति प्राप्त हो गई है। मेरा संशय दूर हो गया है, अब मैं आपके आदेश का पालन करूँगा।)
3. संजय का अंतिम विजय उद्घोष
गीता का समापन संजय के इस अमर श्लोक से होता है:
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥" (18.78)
(जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गांडीवधारी धनुर्धर अर्जुन है; वहीं श्री (ऐश्वर्य), विजय, विभूति और अचल नीति है—यह मेरा पक्का विश्वास है।)