श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 (भक्ति योग): सगुण बनाम निर्गुण, अनन्य भक्ति और प्रिय भक्त के 35 लक्षण
श्रीमद्भगवद्गीता का द्वादश अध्याय 'भक्ति योग' (Bhakti Yoga) गीता का सबसे कोमल, मधुर और हृदयस्पर्शी अध्याय है। इसमें केवल 20 श्लोक हैं, किंतु इसमें भक्ति मार्ग की सरलता और भगवान के सच्चे भक्त के सर्वोच्च आध्यात्मिक लक्षणों का अद्भुत वर्णन है।
1. सगुण साकार और निर्गुण निराकार उपासना
अर्जुन पूछता है कि सगुण साकार रूप की पूजा करने वाले और अव्यक्त निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने वाले—इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है?
श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि जो लोग अपने मन को मुझ सगुण रूप में एकाग्र कर श्रद्धापूर्वक मेरी उपासना करते हैं, वे सर्वश्रेष्ठ योगी हैं। निर्गुण निराकार की उपासना भी परम पद तक पहुंचाती है, किंतु देहधारियों के लिए अव्यक्त ब्रह्म की साधना अत्यंत क्लेशप्रद और कठिन होती है। सगुण भक्ति में भक्त का उद्धार मैं स्वयं शीघ्र कर देता हूँ (तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्)।
2. भगवान को प्रिय भक्त के लक्षण (Characteristics of a True Devotee)
श्लोक 13 से 20 में श्रीकृष्ण उन सद्गुणों की गणना करते हैं, जिन्हें धारण करने वाला भक्त उन्हें अत्यंत प्रिय होता है:
- जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, जो सबका मित्र और करुणामय है।
- जिसके भीतर 'मैं' और 'मेरा' का अहंकार नहीं है, जो सुख और दुःख में सम रहता है और क्षमाशील है।
- जो निरंतर संतुष्ट रहता है, जिसका मन और बुद्धि मुझमें समर्पित है।
- जिससे किसी को उद्वेग (कष्ट) नहीं होता और जो स्वयं किसी से उद्विग्न नहीं होता।
- जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और शोक से मुक्त है।
- जो मान और अपमान में, मित्र और शत्रु में, शीत और उष्ण में समभाव रखता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं—ऐसा अनन्य भक्त मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है (भक्तिमान् यः स मे प्रियः)।