सनातन पंचांग २०२६: माघ, फाल्गुन और चैत्र मास के प्रमुख व्रत एवं त्योहारों का शास्त्रीय विवेचन और समय-सारणी
सनातन धर्म में ‘काल’ (समय) केवल एक भौतिक इकाई नहीं है, बल्कि यह ईश्वर का ही एक स्वरूप है। भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं घोषणा करते हैं— “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो” (मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूँ)। हमारे ऋषि-मुनियों ने खगोलीय गणनाओं और नक्षत्रों की चाल के आधार पर एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति विकसित की, जिसे हम ‘पंचांग’ कहते हैं। यह पंचांग हमें न केवल तिथियों का ज्ञान कराता है, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ हमारे शरीर और आत्मा के सामंजस्य को स्थापित करने के विशिष्ट अवसर (मुहूर्त) भी प्रदान करता है।
शुक्रवार, ३० जनवरी २०२६ से हम एक अत्यंत पवित्र कालखंड में प्रवेश कर रहे हैं। वर्तमान में ‘माघ’ मास अपने अंतिम चरण में है, जो भगवान विष्णु और सूर्य देव की उपासना के लिए मोक्षदायिनी माना गया है। इसके पश्चात ‘फाल्गुन’ मास का आगमन होगा, जो उल्लास, भक्ति और शिव-शक्ति के मिलन (महाशिवरात्रि) का प्रतीक है। तत्पश्चात, ‘चैत्र’ मास के साथ हम नव संवत्सर और शक्ति की उपासना (नवरात्रि) में प्रवेश करेंगे।
आगामी दो माह (फरवरी और मार्च २०२६) आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसमें महाशिवरात्रि की महारात्रि, होली का रंगोत्सव और चैत्र नवरात्रि की शक्ति साधना समाहित है। एक साधक के लिए यह समय अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने और ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर है। यहाँ हम शास्त्रों, पुराणों और ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर आगामी त्योहारों, व्रतों और उनके शुभ मुहूर्तों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
—
माघ पूर्णिमा और माघ मास का समापन (फरवरी २०२६ का प्रारंभ)
माघ मास को शास्त्रों में ‘माधव’ अर्थात भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति माघ मास में नियमपूर्वक स्नान, दान और भगवान विष्णु का पूजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर वैकुंठ लोक को प्राप्त होता है।
माघ पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्त्व
माघ पूर्णिमा इस पवित्र मास का समापन दिवस है। मान्यता है कि इस दिन स्वयं भगवान विष्णु गंगाजल में निवास करते हैं।
संस्कृत श्लोक:
*”माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।”*
(पद्म पुराण)
भावार्थ: जो मनुष्य माघ मास में शीतल जल (विशेषकर गंगा आदि पवित्र नदियों) में स्नान करते हैं, वे पापमुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
इस वर्ष २०२६ में माघ पूर्णिमा १ फरवरी को पड़ रही है। यह कल्पवास की पूर्णाहूति का दिन भी है। इस दिन सत्यनारायण व्रत और रात्रि में चंद्र अर्घ्य का विशेष महत्त्व है।
—
महाशिवरात्रि: शिव और शक्ति के मिलन की महारात्रि
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है। २०२६ में यह पर्व फरवरी के मध्य में आ रहा है। यह वह रात्रि है जब ब्रह्मांड में आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर (ऊर्ध्वगामी) होता है।
शास्त्रीय संदर्भ:
ईशान संहिता के अनुसार, इसी रात्रि को भगवान शिव ‘लिंगोद्भव’ स्वरूप में, अर्थात निराकार से साकार रूप (लिंग रूप) में प्रकट हुए थे।
संस्कृत श्लोक:
*”फाल्गुनस्य सिते पक्षे, चतुर्दश्यां निशागमे।
यस्यां लिंगं समुत्पन्नं, सा रात्रिः शिववल्लभा।।”*
भावार्थ: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की मध्यरात्रि को, जब लिंग स्वरूप प्रकट हुआ, वह रात्रि भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।
इस दिन “ओम नमः शिवाय” के अखंड जाप और चार प्रहर की पूजा का विधान है। प्रथम प्रहर में दूध, द्वितीय में दही, तृतीय में घृत और चतुर्थ प्रहर में मधु से अभिषेक करने का विधान शिव महापुराण में वर्णित है।
—
फाल्गुन और चैत्र मास का विस्तृत पंचांग (फरवरी – मार्च २०२६)
यहाँ ३० जनवरी २०२६ से लेकर मार्च २०२६ के अंत तक के प्रमुख व्रतों और त्योहारों की विस्तृत सूची, तिथियों और मुहूर्तों के साथ प्रस्तुत है। (नोट: समय भारतीय मानक समय – IST पर आधारित है और स्थान भेद से इसमें सूक्ष्म अंतर संभव है)।
१. माघ मास (समापन चरण) एवं फाल्गुन मास – फरवरी २०२६
* तिथि: १ फरवरी २०२६ (रविवार)
* महत्त्व: यह दिन खरीदारी, साधना और नए कार्यों के आरंभ के लिए अक्षय फलदायी है। इसी दिन माघ पूर्णिमा भी है।
* तिथि: १ फरवरी २०२६ (रविवार)
* पूर्णिमा तिथि आरंभ: ३१ जनवरी, सायं ६:४५ बजे
* पूर्णिमा तिथि समापन: १ फरवरी, सायं ५:२० बजे
* विशेष: माघ स्नान का समापन, ललिता जयंती।
* तिथि: १३ फरवरी २०२६ (शुक्रवार)
* एकादशी तिथि आरंभ: १२ फरवरी, रात्रि ९:३५ बजे
* एकादशी तिथि समापन: १३ फरवरी, रात्रि ८:१० बजे
* पारण समय: १४ फरवरी, प्रातः ६:५० से १०:३० तक
* महत्त्व: स्कंद पुराण के अनुसार, इस एकादशी के व्रत से शत्रुओं पर विजय और कठिन परिस्थितियों में सफलता प्राप्त होती है। श्रीराम ने लंका गमन से पूर्व इस व्रत को किया था।
* तिथि: १५ फरवरी २०२६ (रविवार)
* निशीथ काल पूजा मुहूर्त: रात्रि १२:०९ से १:०१ तक (१६ फरवरी की भोर)
* चतुर्दशी तिथि आरंभ: १५ फरवरी, प्रातः ४:४५ बजे
* चतुर्दशी तिथि समापन: १६ फरवरी, प्रातः ३:१० बजे
* विशेष: यह रात्रि जागरण और शिव साधना के लिए वर्ष का सर्वश्रेष्ठ समय है।
* तिथि: १६/१७ फरवरी २०२६
* विशेष: पितृ तर्पण और कालसर्प दोष निवारण हेतु उपयुक्त।
* तिथि: २७ फरवरी २०२६ (शुक्रवार)
* महत्त्व: इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है, जिसमें भगवान विष्णु का वास माना जाता है। यह स्वास्थ्य और मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी है।
—
२. चैत्र मास का आगमन और होली – मार्च २०२६
मार्च २०२६ में हम फाल्गुन की विदाई और चैत्र (हिन्दू नववर्ष) का स्वागत करेंगे।
* तिथि: २ मार्च २०२६ (सोमवार)
* होलिका दहन मुहूर्त: सायं ६:२५ से रात्रि ८:५२ तक
* भद्रा पूंछ: दोपहर ३:५० से सायं ४:५२ तक (भद्रा के बाद ही दहन करें)
* पूर्णिमा तिथि: २ मार्च, प्रातः १०:१० से ३ मार्च, प्रातः ११:४५ तक।
* तिथि: ३ मार्च २०२६ (मंगलवार)
* महत्त्व: भक्त प्रह्लाद की रक्षा और हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के दहन के अगले दिन यह उत्सव मनाया जाता है। यह सात्विक प्रेम और समरसता का प्रतीक है।
* तिथि: १४ मार्च २०२६ (शनिवार)
* महत्त्व: यह संवत्सर की अंतिम एकादशी है। जैसा नाम से स्पष्ट है, यह जाने-अनजाने में किए गए पापों का नाश करती है।
* तिथि: १८ मार्च २०२६ (बुधवार)
* विशेष: विक्रमी संवत २०८२ के आरंभ से पूर्व की यह अंतिम अमावस्या है।
—
नव संवत्सर २०८३ और चैत्र नवरात्रि (मार्च २०२६ का उत्तरार्ध)
१९ मार्च २०२६ से सनातन धर्म के नववर्ष (विक्रम संवत २०८३) का आरंभ होगा। इसी दिन से वासंतिक नवरात्रि (चैत्र नवरात्रि) का भी प्रारंभ होगा।
* तिथि: १९ मार्च २०२६ (बृहस्पतिवार)
* घटस्थापना मुहूर्त: प्रातः ६:२५ से १०:४० तक (शुभ चौघड़िया)
* अभिजित मुहूर्त: दोपहर १२:०५ से १२:५३ तक
* महत्त्व: ब्रह्म पुराण के अनुसार, इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। यह दिन शक्ति की उपासना के नौ दिनों का आरंभ है।
* तिथि: २७ मार्च २०२६ (शुक्रवार)
* मध्याह्न पूजा मुहूर्त: प्रातः ११:१५ से दोपहर १:४५ तक
* विशेष: चैत्र नवरात्रि का समापन और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का प्राकट्य दिवस।
—
आध्यात्मिक जिज्ञासा (FAQ)
प्रश्न: महाशिवरात्रि का व्रत केवल दिन में रखा जाता है या रात्रि में भी?
उत्तर: महाशिवरात्रि का व्रत ‘नक्त’ और ‘अहोरात्र’ दोनों स्वरूपों में होता है, परन्तु मुख्य विधान ‘व्यापिनी’ तिथि का है। इसमें दिन भर उपवास रखकर रात्रि के चारों प्रहर में जागरण और पूजा का विशेष महत्त्व है। स्कंद पुराण के अनुसार, रात्रि जागरण के बिना शिवरात्रि का व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
प्रश्न: क्या विजया एकादशी के दिन चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित है?
उत्तर: जी हाँ, सनातन धर्म के सभी प्रमुख ग्रंथों (जैसे निर्णय सिन्धु) के अनुसार, एकादशी के दिन चावल और अन्न का सेवन शरीर में ‘तमस’ (आलस्य) और जल तत्त्व की अधिकता बढ़ाता है, जो साधना में बाधक है। अतः एकादशी को फलाहार ही ग्रहण करना चाहिए।
प्रश्न: होलिका दहन के समय परिक्रमा का क्या महत्त्व है?
उत्तर: होलिका दहन की अग्नि को अत्यंत पवित्र और नकारात्मकता नाशक माना जाता है। अग्नि की परिक्रमा करते समय हम अपने भीतर के अहंकार और बुराइयों की आहुति देते हैं। प्रह्लाद की भक्ति की विजय के प्रतीक रूप में, यह परिक्रमा हमें भक्ति मार्ग पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देती है।
प्रश्न: चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में क्या अंतर है?
उत्तर: चैत्र नवरात्रि (मार्च-अप्रैल) ‘साधना’ और ‘आत्म-शुद्धि’ के लिए होती है, क्योंकि यह नववर्ष का आरंभ है और ऋतु परिवर्तन (वसंत) का समय है। शारदीय नवरात्रि (सितंबर-अक्टूबर) ‘उत्सव’ और ‘शक्ति प्रदर्शन’ (विजयदशमी) की प्रधानता लिए होती है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्त्व है।
प्रश्न: व्रत का पारण (व्रत खोलना) कब करना चाहिए?
उत्तर: व्रत का पारण सदैव तिथि समाप्त होने के बाद और सूर्योदय के पश्चात करना चाहिए। विशेषकर एकादशी व्रत में ‘हरि वासर’ (द्वादशी का प्रथम चौथाई भाग) समाप्त होने के बाद ही पारण करने का विधान है, अन्यथा व्रत का फल प्राप्त नहीं होता।
—
Experience the Divine Nectar
Join our spiritual journey on YouTube. Daily Vedic insights, sacred Mantras, and profound scriptural commentary from the Vedas and Puranas.
Shared with devotion via Bhakti Amrit Sanatan Divine Editor
शान्ति: शान्ति: शान्ति: