संत चरित्र: पृथ्वी पर चलते-फिरते तीर्थ और उनका दिव्य प्रभाव
संत चरित्र: पृथ्वी पर चलते-फिरते तीर्थ और उनका दिव्य प्रभाव भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की नींव केवल ईंट-पत्थरों से बने मंदिरों पर नहीं, बल्कि उन चैतन्य मंदिरों पर टिकी है जिन्हें हम ‘संत’ कहते हैं। संत केवल एक वेशभूषा या संप्रदाय का नाम नहीं है; यह चेतना की वह सर्वोच्च अवस्था है जहाँ जीवात्मा परमात्मा के साथ एकाकार हो जाती है। वेदों और उपनिषदों में ऋषियों ने स्पष्ट किया है कि ईश्वर निराकार होकर सर्वत्र व्याप्त हैं, लेकिन जब वे साकार रूप में अपनी करुणा प्रकट करना चाहते हैं, तो वे संतों के हृदय के माध्यम से जगत में अवतरित होते हैं। एक सच्चा संत उस पारसमणि के समान है जो लोहे को स्पर्श कर सोना बना देता है, किन्तु संत की महिमा पारस से भी अधिक है क्योंकि वे शिष्य को अपने समान ही ‘संत’ बना देते हैं। आज, जब हम 30 जनवरी 2026 के पावन समय में …