श्री हनुमान बाल लीला: प्रभात के सूर्य को स्वादिष्ट फल समझना, देवराज इंद्र का वज्र और अमोघ वरदान

श्री हनुमान बाल लीला: प्रभात के सूर्य को स्वादिष्ट फल समझना, देवराज इंद्र का वज्र और अमोघ वरदान

1. बाल मारुति की भूख और प्रभात कालीन लाल सूर्य

वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड और हनुमान चालीसा ('जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥') में वर्णित पवनपुत्र श्री हनुमान जी की बाल लीला सनातन जगत के बच्चों और बड़ों सभी के लिए असीम आनंद और विस्मय का स्रोत है। वानरराज केसरी और माता अंजना के आश्रम में जब बालक मारुति खेलते-खेलते भूख से व्याकुल हो उठे, तो उन्होंने अपनी माता को पुकारा। माता अंजना किसी कार्यवश कुटिया में नहीं थीं।

तभी नन्हें मारुति की दृष्टि पूर्व दिशा में उदित होते हुए लाल-लाल बाल सूर्य पर पड़ी। उस गोल और दमकते हुए सूर्य को देखकर बालक ने सोचा कि यह कोई पका हुआ अत्यंत स्वादिष्ट मीठा फल है। पवन के समान तीव्र गति से उड़ने की जन्मजात शक्ति से संपन्न बालक ने एक ही छलांग में आकाश मार्ग की ओर उड़ान भर दी।

2. राहु का पलायन और इंद्र का ऐरावत पर आगमन

जिस दिन बालक मारुति सूर्य को पकड़ने के लिए बढ़े, उसी दिन अमावस्या थी और राहु भगवान सूर्य को ग्रसने (सूर्य ग्रहण लगाने) के लिए आ रहा था। जब राहु ने देखा कि एक अत्यंत तेजस्वी बालक सूर्य की ओर बिजली की गति से झपट रहा है, तो वह भयभीत होकर देवराज इंद्र के पास भागा और बोला— 'हे देवराज! आज सूर्य को ग्रसने के लिए मुझसे पूर्व ही किसी दूसरे महाबली ने अधिकार कर लिया है।'

इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर तुरंत घटना स्थल पर पहुंचे। इधर बाल मारुति ने जब ऐरावत हाथी को देखा, तो उसे भी एक बड़ा खिलौना समझकर वे उसकी ओर लपके। बालक के असीम तेज और निडरता से घबराकर इंद्र ने आत्मरक्षा में अपने वज्र से बालक की ठोड़ी (हनु) पर तीव्र प्रहार कर दिया।

3. वज्र प्रहार, पवनदेव का क्रोध और संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार

वज्र के आघात से बालक की बाईं हनु (ठोड़ी) टूट गई और वे मूर्च्छित होकर पर्वत के शिखर पर गिर पड़े। जब वायुदेव ने अपने प्राणप्रिय पुत्र को रक्त से लथपथ और मूर्च्छित देखा, तो वे अत्यंत कुपित हो उठे। उन्होंने समस्त सृष्टि में वायु के संचरण (बहने) को रोक दिया।

हवा के रुकते ही जीवधारियों का दम घुटने लगा, पौधे मुरझाने लगे और तीनों लोकों में प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। समस्त देवता, गंधर्व और ऋषि-मुनि ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे। ब्रह्मा जी सभी देवताओं को साथ लेकर उस पर्वत पर आए जहाँ पवनदेव बालक को गोद में लिए विलाप कर रहे थे। ब्रह्मा जी ने अपने दिव्य हाथों से बालक का स्पर्श किया, जिससे वे तुरंत स्वस्थ होकर मुस्कुराने लगे।

4. देवताओं द्वारा अमोघ वरदान और 'हनुमान' नामकरण

बालक के जीवित होते ही पवनदेव प्रसन्न हो गए और संसार में पुनः प्राणवायु का संचार हुआ। इसके पश्चात समस्त देवताओं ने उस बालक को ऐसे अलौकिक वरदान दिए, जिसने उन्हें भविष्य में 'संकटमोचन' बना दिया:

  • इंद्र देव: 'मेरी हनु पर वज्र का आघात होने से आज से इस बालक का नाम "हनुमान" होगा और इस पर मेरा वज्र भी कभी निष्फल रहेगा।'
  • ब्रह्मा जी: बालक को दीर्घायु, इच्छानुसार रूप बदलने और किसी भी ब्रह्मास्त्र से अवध्य होने का वरदान दिया।
  • भगवान शिव: किसी भी अस्त्र-शस्त्र से कभी मृत्यु न होने और असीम आत्मबल का आशीर्वाद दिया।
  • सूर्य देव: अपने तेज का सौवां भाग और समस्त वेदों व शास्त्रों के प्रकांड ज्ञान का वरदान दिया।
  • यम और कुबेर: यमदंड से मुक्ति और कभी युद्ध में पराजित न होने का आशीर्वाद दिया।

5. बाल लीला का आध्यात्मिक रहस्य

हनुमान जी की यह बाल कथा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानव चेतना की अनंत संभावनाओं का प्रतीक है:

  • साधना की छलांग: सूर्य ज्ञान का साक्षात स्वरूप है। बालक का सूर्य की ओर उड़ना यह दर्शाता है कि यदि जीव के पास निष्कपट बाल-सुलभ श्रद्धा हो, तो वह ज्ञान के सूर्य को भी सहज प्राप्त कर सकता है।
  • संकट ही सिद्धि का मार्ग: वज्र का आघात संकट प्रतीत हुआ, परंतु उसी आघात के कारण बालक को समस्त देवताओं के अमोघ वरदान और 'हनुमान' नाम की प्राप्ति हुई। जीवन में आने वाली कठिनाइयां हमारे भीतर की शक्तियों को जागृत करती हैं।
  • विनम्रता और सेवा: समस्त शक्तियों से संपन्न होने के बाद भी हनुमान जी ने कभी अहंकार नहीं किया, बल्कि वे सदैव प्रभु श्री राम के चरणों में 'दास' बनकर रहे।

6. प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

बाल हनुमान ने सूर्य को क्या समझकर छलांग लगाई थी?

बालक हनुमान ने प्रभात काल के गोल, लाल और प्रकाशमान सूर्य को कोई अत्यंत मीठा और पका हुआ फल समझकर खाने के लिए आकाश में उड़ान भरी थी।

हनुमान जी का नाम 'हनुमान' कैसे पड़ा?

इंद्र के वज्र प्रहार से बालक की 'हनु' (ठोड़ी) पर चोट लगी और वह टूट गई थी। संस्कृत में हनु के भग्न होने के कारण देवराज इंद्र ने उन्हें 'हनुमान' नाम दिया।

पवनदेव के क्रोधित होने पर क्या हुआ था?

पवनदेव ने संसार में वायु का प्रवाह रोक दिया था, जिससे समस्त प्राणियों का श्वास रुकने लगा और सृष्टि पर महासंकट आ गया था। ब्रह्मा जी के अनुनय और बालक के पुनर्जीवित होने पर ही वायु पुनः प्रवाहित हुई।

7. संबंधित पावन कथाएं एवं आंतरिक दर्शन

सनातन धर्म की अन्य पावन कथाओं और लीलाओं के अध्ययन हेतु अवश्य पढ़ें: