समुद्र मंथन कथा: क्षीरसागर से निकले 14 दिव्य रत्न, हलाहल विष और भगवान शिव का नीलकंठ रूप
श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कंध) में वर्णित समुद्र मंथन (Samudra Manthan) सनातन धर्म का एक अत्यंत गहन, रोमांचक और प्रतीकात्मक प्रसंग है। दुर्वासा ऋषि के शाप से जब देवराज इंद्र श्रीहीन हो गए और असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, तब भगवान विष्णु के परामर्श पर देवताओं और दानवों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया था।
मंथन की तैयारी और भगवान का कूर्म अवतार
मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती (रस्सी) बनाया गया। असुरों ने वासुकि के मुख की ओर और देवताओं ने पूंछ की ओर से पकड़ा। जब मंदराचल पर्वत क्षीरसागर के तल में धंसने लगा, तब भगवान विष्णु ने विशाल कूर्म (कछुआ) का रूप धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर थाम लिया।
हलाहल विष और महादेव का 'नीलकंठ' अवतार
मंथन के प्रारंभ में सबसे पहले महाविनाशक 'कालकूट' (हलाहल) विष निकला, जिसकी तीक्ष्ण ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। समस्त देवता और ऋषि महादेव की शरण में दौड़े। करुणा के सागर भगवान शिव ने जगत की रक्षा हेतु उस समस्त विष को अपनी हथेली पर रखकर पी लिया और माता पार्वती ने अपने हाथों से शिवजी के कंठ को पकड़ लिया ताकि विष उनके पेट में न जा सके। विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे सदा के लिए 'नीलकंठ' कहलाए।
क्षीरसागर से प्रकट हुए 14 दिव्य रत्न
- हलाहल विष: भगवान शिव द्वारा पान किया गया।
- कामधेनु गाय: ऋषियों को यज्ञ और हविष्य हेतु दी गई।
- उच्चैःश्रवा घोड़ा: सात मुखों वाला श्वेत अश्व, जो राजा बलि को मिला।
- ऐरावत हाथी: चार दांतों वाला श्वेत गज, जो देवराज इंद्र ने ग्रहण किया।
- कौस्तुभ मणि: भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने वक्षस्थल पर धारण की।
- पारिजात वृक्ष: देवलोक का अमर कल्पवृक्ष।
- अप्सरा रंभा: देवलोक की नर्तकी।
- माँ महालक्ष्मी: धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री, जिन्होंने भगवान विष्णु को पति रूप में चुना।
- वारुणी मदिरा: असुरों ने ग्रहण की।
- चंद्रमा: भगवान शिव ने अपने मस्तक पर आभूषण रूप में धारण किया।
- पारिजात/सारंग धनुष: भगवान विष्णु का अमोघ धनुष।
- पाञ्चजन्य शंख: भगवान विष्णु का दिव्य शंख।
- भगवान धन्वंतरि: आयुर्वेद के जनक, जो हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
- अमृत: जिसे भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धरकर देवताओं को पिलाकर अमर कर दिया।